प्रदेश विधानसभाओें को कम नहीं, बल्कि ज्यादा मीडिया कवरेज की जरूरत है

ज्यादातर विधानसभाएं अपने काम और विधायी जानकारी को न के बराबर सार्वजनिक करती हैं।

कर्नाटक विधानसभा का तीन दिन का सत्र पिछले हफ्ते खत्म हो गया। जब सत्र चालू होता है, तो विधानसभा की कार्यवाही केंद्र में होती है। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। स्पीकर विश्वेश्वर हेगड़े कागेरी का एक फैसला कार्यवाही के दौरान खूब चर्चा में रहा। उन्होंने प्राइवेट टेलीविजन चैनलों के कैमरों द्वारा सत्र की  वीडियो रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध लगा दिया।

कागेरी ने मीडिया से कहा, ''हां हमने विधानसभा के भीतर कैमरों इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। कर्नाटक विधानसभा में सभी कार्यवाही की रिकॉर्डिंग की जाती है, पत्रकार उससे विजुअल ले सकते हैं। अब विधानसभा और विधानपरिषद में कैमरामैन को आने की अनुमति नहीं होगी।'' कागेरी ने बताया कि यह तात्कालिक फैसला है और इससे बिना कैमरे वाले पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

स्पीकर के फैसले पर चारों तरफ से प्रतिक्रिया आईं। विधानसभा कवर करने वाले पत्रकारों ने फैसले का विरोध किया। पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी और सिद्धारमैया ने भी फैसले को गलत बताया। एक ट्वीट में मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा ने कहा, 'मेरी सरकार मीडिया की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध है। मैं स्पीकर विश्वेश्वरा हेगडे कागेरी से बात कर फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग करूंगा।' हालांकि इस ट्वीट को येदुरप्पा ने बाद में हटा दिया।

विधायी समितियां प्रतिनिधिक संस्थान हैं। एक सुचारू लोकतंत्र में उनके काम के बारें में जनता को आसानी से पता होना चाहिए। कर्नाटक स्पीकर के फैसले से विधानसभा की जनता से निकटता के मुद्दे पर सवाल उठता है। फिलहाल तीन तंत्रों से विधायी संस्थाओं की कार्यशैली को सामने रखा जाता है।

मीडिया को विधायी कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने देना पहला तरीका है। इसके बाद विधानसभा कार्यवाही का लाइव ब्रॉडकास्ट दूसरा तरीका है जिससे फैसले लेने वाली इन संस्थाओं के बारे में जनता को जानकारी मिलती है। इनके अलावा एक तीसरा तरीका है, जिसमें विधायी जानकारी को पढ़ने योग्य बनाया जाता है। दुर्भाग्य से ज्यादातर राज्यों में तीनों तंत्र बदहाली की स्थिति में हैं।

हम पहले तरीके से शुरू करते हैं। देश की ज्यादातर विधानसभाओं में एक तंत्र होता है, जिसके जरिए टीवी और प्रिंट के पत्रकारों को मान्यता दी जाती है। इससे उन्हें विधानसभा में जाने का मौका मिलता है, जहां से वो विधानसभा के काम की रिपोर्टिंग कर सकते हैं। आमतौर पर स्पीकर द्वारा गठित एक कमेटी आवेदनों की जांच कर, विधानसभा में एंट्री पाने के लिए जरूरी प्रेस पास के योग्य पत्रकारों का नाम आगे बढ़ाती है।इस कमेटी में आमतौर पर वरिष्ठ पत्रकार शामिल होते हैं।

मान्यता प्राप्त पत्रकारों की प्रेस गैलरी और विधानसभा में पहुंच के चलते उन्हें विधायकों, मंत्रियों और सचिवालय अधिकारियों के साथ घुलने-मिलने का मौका मिलता है। इससे उन्हें बारीकियां समझने में मदद मिलती है और उनकी रिपोर्ट्स में अच्छी बुनावट आती है। इससे पाठकों को राजनीति, जनमत निर्माण और विमर्श के बारे में गहरी जानकारी मिलती है। मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सरकारी बजट, विधेयक, सवालों आदि की प्रतियां भी दी जाती हैं।

इस तंत्र से विधानसभा का काम जनता के सामने आया है। हालांकि वक्त के साथ इसमें दूरी भी आई है। उदाहरण के लोगों की खबरें देखने की आदत में अब इंटरनेट प्रमुख स्त्रोत है। इंटरनेट की बढ़ती पहुंच, एक बड़ी युवा आबादी, सस्ता इंटरनेट और मोबाइल से ऑनलाइन खबरें पढ़ने वाले पाठकों की संख्या में बहुत तेजी आई है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन से पता चलता है कि, 'ऑनलाइन न्यूज (56 प्रतिशत), खासकर सोशल मीडिया (28 प्रतिशत) ने 35 साल से कम उम्र के लोगों में खबरें पढ़ने के स्त्रोत के मामले में प्रिंट (16 प्रतिशत) को पीछे छोड़ दिया है। वहीं 35 साल से ज्यादा उम्र के लोग ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से मिलाकर खबरें पढ़ते हैं।' पाठकों की मांग और इंटरनेट पब्लिशिंग के फायदों के चलते बहुत सारे ऐसे पब्लिकेशन सामने आए हैं, जो केवल ऑनलाइन काम करते हैं।

हालांकि जब विधानसभा की रिपोर्टिंग की बात आती है तो ऑनलाइन न्यूज पब्लिकेशन, प्रिंट और टीवी के मुकाबले बहुत घाटे में हैं। कई राज्य विधानसभाएं केवल प्रिंट और टीवी के पत्रकारों को मान्यता देती हैं। इसलिए ऑनलाइन पब्लिकेशन या गैर टीवी वीडियो प्लेटफॉर्म के पत्रकारों को विधायी संस्थानों में उस तरह की पहुंच नहीं मिलती है।

संसद ने ऑनलाइन न्यूज पब्लिकेशन के पत्रकारों को पहुंच देने की दिशा में कदम उठाए हैं।  लोकसभा ने प्रेस गैलरी में ऑनलाइन न्यूज पोर्टल के पत्रकारों की पहुंच से संबंधित गाइडलाइन पेश की है। विधानसभाओं को लोकसभा की गाइडलाइन के साथ-साथ दुनिया भर की संसदों की तरफ देखने की जरूरत है, जिन्होंने खुद को ऑनलाइन न्यूज संगठनों के लिए खोला है, ताकि वे अपना काम बेहतर तरीके से जनता तक पहुंचा सकें।

दूसरा तंत्र विधानसभा पर केंद्रित वेबसाइट का है। यह बेहद आसान तरीका है जिससे जनप्रतिनिधि और विधानसभा एक बतौर संस्थान अपने काम को लोगों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन ज्यादातर विधानसभाओं की वेबसाइट केवल सामान्य जानकारी ही देती नजर आती हैं। ज्यादातर में सवाल और उनके जवाब, विमर्श के मुद्दों की जानकारी नहीं होती। न ही विधानसभा द्वारा पास किए गए विधेयकों की प्रतियां इन पर मिलती हैं। कुछ जगह विस्तार में जानकारी होती है, लेकिन न तो यह वक्त पर उपलब्ध होती है, न इसे लागातार अपडेट किया जाता है। फिर भी कुछ अपवाद हैं। हिमाचल प्रदेश, केरल उत्तरप्रदेश मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, दूसरे राज्यों की विधानसभाओं से इस मामले में बहुत आगे हैं।

फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यक्रम चल रहा है, जिसके जरिए विधानसभा के काम को डिजिटलाइज किया जाएगा। राज्य विधानसभाएं संसद से सीख सकती हैं। संसद में दोनों सदनों की वेबसाइट पर अच्छा काम हुआ है। इन वेबसाइट पर उनके काम की जानकारी विस्तार से उपलब्ध है। साथ ही यह वेबसाइट पिछले कई सालों में अलग-अलग संसदीय समतियों द्वारा पेश की गई रिपोर्ट्स का बड़ा रिकॉर्ड भी रखती हैं। इन वेबसाइट पर सांसदों और उनसे मिलने के लिए जरूरी जानकारी भी उपलब्ध है।

राज्य विधानसभाओं में कार्यवाही का नियमित टेलीकास्ट भी ठीक से नहीं किया जाता। इस अंतराल के लिए विधानसभा सत्रों के कम दिन और संसाधनों के आभाव को कारण बताया जाता है। तमिलनाडु सरकार ने 2015 में लाइव ब्रॉडकास्टिंग के विरोध पर अपनी स्थिति साफ कर दी थी। उन्होंने इसके लिए संसाधनों की कमी को जिम्मेदार बताया था।

फिलहाल बहुत कम विधानसभाएं अपनी कार्यवाही का सीधा प्रसारण करती हैं। कुछ (आंध्रप्रदेश, तेलंगाना) ने कैमरा सेटअप लगाया है ताकि टीवी ब्रॉडकास्टर्स को सामग्री उपलब्ध कराई जा सके। दूसरी तरफ कुछ राज्यों ने क्षेत्रीय स्तर पर सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन की मदद ली है। कुछ राज्यों ने प्राइवेट न्यूज चैनल को विधानसभा कार्यवाही के प्रसारण की अनुमति दी है।

कर्नाटक दिल्ली बिहार, गोवा और केरल की विधानसभाएं अपनी कार्यवाही का वेबकास्ट करती हैं। पर जो विधानसभाएं ब्रॉडकास्ट करती हैं, वे महज अपवाद हैं, न कि यह बतौर नियम है। इस मामले में संसद ने नज़ीर पेश की है, जिसकी कार्यवाही का दोनों सदनों के खुद के चैनलों पर सीधा प्रसारण होता है।

पारदर्शिता और सुलभ पहुंच वाली विधानसभा से लोगों में नीतिगत मुद्दों की अच्छी समझ बनती है। वे किसी मुद्दे पर अपने प्रतिनिधि की स्थिति को भी बेहतर देख पाते हैं। चुनावों से बढ़ते हुए यह कदम पूरी विधानसभा के दौरान जनभागीदारी को सुचारू करवाते हैं और एक आमजन को प्रभावित करने वाले फैसलों पर प्रतिक्रिया का एक स्वस्थ्य चक्र बन पाता है।

एक अच्छे लोकतंत्र में विधानसभा को जनसुलभ रखने के लिए लगातार विचार और काम करने की जरूरत होती है। अब समय आ चुका है कि हमारी विधानसभाएं इस मोर्चे पर संसाधन खर्च करें और दिमाग लगाएं।

चकशु रॉय PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च में विधायी और जन भागीदारी उपक्रम के प्रमुख हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल लेख आप नीचे लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं। 

Why State Assemblies Need More, Not Less, Media Coverage