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दिल्ली एनसीआर में जल प्रदूषण

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री भुवनेश्वर कलिता) ने 9 दिसंबर, 2025 को "दिल्ली एनसीआर में जल प्रदूषण और उसके निवारण हेतु विभिन्न एजेंसियों द्वारा उठाए गए कदम" विषय पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • दूषित पदार्थों की निगरानी: कमिटी ने पल्ला, वज़ीराबाद और शाहदरा नाले के बीच यमुना नदी के जल की गुणवत्ता में गंभीर गिरावट देखी। कमिटी ने इन क्षेत्रों में मौजूदा निगरानी प्रणालियों की संख्या और आवृत्ति बढ़ाने का सुझाव दिया। कमिटी ने दूषित पदार्थों के बीच बेहतर अंतर करने के लिए संदूषक मापदंडों के विस्तार का सुझाव दिया जिसमें केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) को शामिल किया जाए। सीओडी पानी की गुणवत्ता का वह पैमाना होता है जो सभी कार्बनिक पदार्थों को रासायनिक रूप से ऑक्सीकृत करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की कुल मात्रा को दर्शाता है। कमिटी ने भूजल में विभिन्न अशुद्धियों की नियमित ट्रैंकिंग करने का भी सुझाव दिया।

  • सीवेज का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शहर में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट जल के संबंध में विश्वसनीय आंकड़ों का अभाव है और उसने शहर के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रदूषक भार की मात्रा की रियल टाइम ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग करने का सुझाव दिया। कमिटी ने जल वितरण में भारी नुकसान को देखते हुए जल आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत करने का भी सुझाव दिया। उसने यह भी पाया कि दिल्ली में बड़ी संख्या में घरों के पास भूमिगत सीवरेज नेटवर्क का कनेक्शन नहीं है जिससे सीवेज खुले नालों में गिर रहा है। उसने सेप्टिक टैंक साफ करने वाले टैंकरों के औपचारिकीकरण का सुझाव दिया। कमिटी ने उपचारित अपशिष्ट जल को नदी में छोड़ने, या सिंचाई और भूजल पुनर्भरण जैसे गैर-पीने योग्य उद्देश्यों के लिए इसके दोबारा से उपयोग को अनिवार्य बनाने का भी सुझाव दिया। इसके अलावा उसने उपचारित अपशिष्ट जल के गुणवत्ता मानकों में संशोधन का सुझाव दिया ताकि पानी से कुछ पोषक तत्व बाहर न निकल सकें।

  • औद्योगिक जल प्रदूषण: कमिटी ने पाया कि दिल्ली में स्थित 13 साझा अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपीज़) अपनी क्षमता के सिर्फ 34% पर ही काम कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि औद्योगिक अपशिष्ट जल की एक बड़ी मात्रा को उपचारित किए बिना ही नगर निगम के सीवेज सिस्टम या नालों में बहाया जा रहा है। कमिटी ने आगे कहा कि 2024 तक अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले 189 उद्योगों (जीपीआईज़) में 49 उपचार मानकों का पालन नहीं किया जा रहा। इसके अलावा कई उद्योग अनाधिकृत क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गए हैं, जिससे नदी में ऐसा प्रदूषण हो सकता है जिसका पता लगाना कठिन है। कमिटी ने सभी उद्योगों पर नज़र रखने के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईसी) आधारित मैपिंग करने और मॉड्यूलर सीईटीपी स्थापित करने का सुझाव दिया। उसने आगे कहा कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) तकनीक अपशिष्ट जल उपचार के लिए सीईटीपी की तुलना में अधिक प्रभावी है, हालांकि यह महंगी है। कमिटी ने उन औद्योगिक इकाइयों को, जो जेडएलडी का खर्च नहीं उठा सकतीं, कम या शून्य ब्याज पर एक समर्पित ऋण प्रदान करने का सुझाव दिया।

  • यमुना का पर्यावरणीय प्रवाह: पर्यावरणीय प्रवाह का अर्थ है, नदियों में जल प्रवाह की मात्रा, समय, अवधि, आवृत्ति और गुणवत्ता। कमिटी ने कम पानी वाले मौसम के लिए वैज्ञानिक रूप से अनुशंसित पर्यावरण प्रवाह पर निर्णय लेने हेतु 'यमुना नदी बेसिन बोर्ड' की बैठक फिर से करने का सुझाव दिया। कमिटी ने नदी में कचरा बहाने वाले जल-गहन उद्योगों पर उपकर लगाने का सुझाव दिया जिसका उपयोग सिंचाई नहरों के आधुनिकीकरण और उन्नत सीवेज उपचार तकनीकों को लागू करने के लिए किया जा सके। इससे पानी की गुणवत्ता और मात्रा में सुधार होगा, जिससे अंततः पर्यावरणीय प्रवाह बेहतर होगा। कमिटी ने यमुना नदी के तट पर स्थित राज्यों के बीच भविष्य के जल बंटवारा समझौतों की समय सीमा को 30 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष करने का भी सुझाव दिया।

  • बाढ़ के मैदानों का कायाकल्प: कमिटी ने अतिक्रमण, रेत खनन और अवैध डंपिंग से निपटने के लिए उपाय सुझाए और इन कार्यों के लिए सख्त दंड सुनिश्चित करने का सुझाव दिया। उसने अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए यमुना के बाढ़ के मैदानों के भीतर भूजल निकासी पर पूर्ण पाबंदी लगाने का भी सुझाव दिया। उसने वनीकरण और देसी पेड़ों व घास के पारिस्थितिक पुनरुद्धार के साथ-साथ गाद हटाने की एक लक्षित योजना का भी सुझाव दिया।

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य: कमिटी ने पानी की गुणवत्ता और बीमारियों के प्रसार के आंकड़ों पर नज़र रखने के लिए एक सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया। उसने विशेष रूप से कम आय वाले और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में दस्त के उपचार के लिए समर्पित स्वास्थ्य इकाइयों और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों का सुझाव दिया। उसने वॉटर प्यूरीफायर और उनके पुर्जों पर जीएसटी को खत्म करने या कम करने का भी सुझाव दिया।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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