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भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन एक्ट 2013- कार्यान्वयन और प्रभावशीलता

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • ग्रामीण विकास और पंचायती राज से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री सप्तगिरि शंकर उलाका) ने 18 दिसंबर, 2025 को 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन एक्ट, 2013 (एलएआरआर एक्ट) में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार- कार्यान्वयन और प्रभावशीलता' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

  • ग्राम सभा को मजबूत करना: कमिटी ने कहा कि ग्राम सभा की सहमति अक्सर केवल औपचारिकतावश ली जाती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी भूमि अधिग्रहणों के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य की जाए, न कि केवल अनुसूचित क्षेत्रों में, जो संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में शामिल प्रमुख आदिवासी आबादी वाले क्षेत्र हैं। कमिटी ने कहा कि ग्राम सभा को उन भूमि अधिग्रहण प्रस्तावों पर वीटो का अधिकार दिया जाए जो सामुदायिक हितों के अनुरूप नहीं हैं। एक्ट के तहत सरकार के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) करना अनिवार्य है ताकि आजीविका और समुदायों पर उसके प्रभावों का मूल्यांकन किया जा सके। कमिटी ने एसआईए के सुझावों को बाध्यकारी बनाने की अनुशंसा की।

  • पुनर्वास: पुनर्वास के संबंध में कमिटी ने कुछ मुद्दों पर गौर किया जैसे: (i) भूमि के बदले भूमि के विकल्पों की निम्न गुणवत्ता, (ii) पुनर्वास कॉलोनियों में बुनियादी सेवाओं का अभाव, और (iii) रोजगार संबंधी प्रतिबद्धताओं का पूरा न होना। कमिटी ने सुझाव दिया कि जब तक चालू सेवाओं से सुसज्जित पुनर्वास स्थल तैयार न हो जाएं, तब तक किसी को भी भूमि पर कब्जा नहीं दिया जाना चाहिए। इसके अलावा परिवार-वार आजीविका योजनाएं तैयार की जानी चाहिए जिनमें महत्वपूर्ण चरण निर्धारित हों, महिलाओं को संयुक्त स्वामी के रूप में गिना जाए और स्वतंत्र वार्षिक ऑडिट किए जाएं।

  • एनएमसी की भूमिका: कमिटी ने कहा कि कानून के तहत गठित राष्ट्रीय निगरानी समिति (एनएमसी) केन-बेतवा नदियों को जोड़ने का काम नहीं कर पाई है और न ही वह पोलावरम जैसी परियोजनाओं से संबंधित शिकायतों को दूर कर पाई है। इन परियोजनाओं में प्रभाव आकलन टुकड़ों में किए गए हैं और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को अपर्याप्त रूप से प्रस्तुत किया गया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में सामाजिक और पर्यावरणीय आकलन को एक साथ किया जाना चाहिए। उसने यह सुझाव भी दिया कि एनएमसी को ऐसे मामलों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने, स्पष्ट निगरानी दिशानिर्देश देने और एक केंद्रीकृत शिकायत निवारण पोर्टल बनाने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

  • भूमि के गलत वर्गीकरण को रोकना: कमिटी ने कहा कि मुआवजे को कम करने के लिए ग्रीनफील्ड भूमि को ब्राउनफील्ड भूमि और ग्रामीण भूमि को शहरी भूमि के रूप में वर्गीकृत किया जा रहा है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय मनमाने ढंग से होने वाले इन परिवर्तनों और पुनर्वर्गीकरणों को रोकने में मदद के लिए एक केंद्रीय निगरानी तंत्र बनाए। उसने विस्तृत खुलासे अनिवार्य करने और हेरफेर करने वाले अधिकारियों को दंड देने का सुझाव भी दिया।

  • अनुसूचित क्षेत्रों में कार्यान्वयन: कमिटी ने अनुसूचित क्षेत्रों में कानून के कार्यान्वयन में कई कमियों का उल्लेख किया, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) भूमि को वास्तविक मूल्य से कम आंकना, (ii) बिना उचित दस्तावेज़ीकरण के ग्राम सभाओं से देर से और केवल नाममात्र की बातचीत करना, और (iii) समुदाय की वास्तविक भागीदारी के बिना मशीनी तरीके से अनुपालन प्रमाणपत्र जारी करना। कमिटी ने मंत्रालय को निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पूरी प्रक्रिया के अनुपालन की निगरानी करे और सुनिश्चित करे, (ii) बाजार मूल्य और मुआवजे की राशि का पारदर्शी खुलासा सुनिश्चित करे, और (iii) पुनर्वास और पुनर्स्थापन पैकेज पूरी तरह से दिए जाने तक भूमि कब्ज़ाने पर रोक लगाए।

  • आदिवासी क्षेत्रों में उचित मुआवजा: कमिटी ने आदिवासी क्षेत्रों में कानून के कार्यान्वयन में कई समस्याओं पर गौर किया जैसे: (i) पुराने सर्कल रेट के कारण भूमि का कम मूल्यांकन, (ii) समुदाय द्वारा उपयोग किए जाने वाले सामान्य संसाधनों (जैसे जंगल, पानी के स्रोत) को मुआवजे की गणना से बाहर रखना, (iii) मुद्रास्फीति से संबंधित नुकसान को समायोजित किए बिना भुगतान में देरी करना, और (iv) औपचारिक भूमि स्वामित्व के बिना परिवारों को केवल नाममात्र की सहायता देना। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) भूमि मूल्य से परे 'आजीविका मूल्य' की गणना, (ii) स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ताओं का उपयोग करके सर्कल रेट को अपडेट करना, और (iii) भुगतान में देरी के लिए सूचकांक आधारित ब्याज प्रदान करना।

  • पेसा का अनुपालन: कमिटी ने एलएआरआर एक्ट को पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) एक्ट, 1996 (पेसा) के प्रावधानों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पेसा के तहत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य बनाया जाए, (ii) सामाजिक प्रभाव आकलन प्रक्रिया के हिस्से के रूप में, ग्राम सभाओं को प्रस्तावों को मंजूरी देने या अस्वीकार करने का अधिकार दिया जाए, और (iii) बेहतर कार्यान्वयन के लिए अधिकारियों को जनजातीय संस्कृति और रीति-रिवाजों का प्रशिक्षण दिया जाए।

  • एफआरए के साथ एकीकरण: कमिटी ने कहा कि कई मामलों में वन अधिकार एक्ट (एफआरए), 2006 का का उल्लंघन करके वन भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। उसने कहा कि अक्सर प्रभावित परिवारों को जमीन और आजीविका खोने के बावजूद लगभग 15 लाख रुपए का अपर्याप्त मुआवजा ही मिलता है। उसने सुझाव दिया कि एफआरए के प्रावधानों को भूमि अधिग्रहण एक्ट के साथ एकीकृत किया जाए और मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को शामिल किया जाए, जैसे कि गांव की सीमाओं के भीतर आने वाली साझा वन भूमि से जुड़े अधिकार।

 

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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