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भारत और अंतरराष्ट्रीय कानून

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • विदेशी मामलों संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: पी.पी. चौधरी) ने 10 सितंबर, 2021 को 'भारत और अंतरराष्ट्रीय कानून, विदेशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां, शरण संबंधी मुद्दे, अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा और वित्तीय अपराध सहित' विषय पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करना: कमिटी ने कहा कि भारत द्विविधता (डुअलिज्म) के सिद्धांत का पालन करता है (यानी घरेलू स्तर पर अंतरराष्ट्रीय कानून सीधे लागू नहीं होते हैं, और उन्हें संसद के कानून के जरिए लागू किया जाना चाहिए)। उसने कहा कि कई मौकों पर सर्वोच्च न्यायालय इस सिद्धांत को नहीं मानता। राज्य के विभिन्न संस्थानों के बीच तालमेल सुनिश्चित करने के लिए कमिटी ने सुझाव दिया कि विदेश मंत्रालय उन मामलों में संबंधित मंत्रालयों के साथ समन्वय स्थापित करे जिनमें घरेलू कानून में कोई वैक्यूम है। इसके अतिरिक्त उसने संबंधित मंत्रालयों के साथ वर्किंग ग्रुप बनाने का सुझाव दिया ताकि अंतरराष्ट्रीय कानून में भारत की क्षमता और विशेषज्ञता को मजबूत किया जा सके।
     
  • प्रत्यर्पण संधियां: अनुरोध पर किसी ऐसे व्यक्ति के समर्पण की प्रक्रिया को प्रत्यर्पण कहा जाता है जिस पर अपराध करने का आरोप है और किसी एक देश में उस पर मुकदमा चलाया जा रहा है, और वह दूसरे देश में रहता है। भारत ने 50 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां की हैं और 11 देशों के साथ प्रत्यर्पण व्यवस्थाएं की हैं। कमिटी ने उन देशों में शरण लेने वाले अपराधियों के प्रत्यर्पण में देरी पर गौर किया जिनके साथ भारत ने प्रत्यर्पण संधियां या व्यवस्थाएं की हैं। इसके अतिरिक्त यह भी देखा गया कि अपराधी ऐसे देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि न होने का लाभ उठाते हैं जहां वे निवेश के माध्यम से नागरिकता या निवास प्राप्त कर सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऐसे देशों की पहचान की जाए और प्राथमिकता के आधार पर उनके साथ प्रत्यर्पण संधियां की जाएं। 
     
  • कमिटी ने कहा कि भारत ने 40 देशों के साथ परस्पर कानूनी सहायता संधियों (एमएलएटीज़) पर हस्ताक्षर किए हैं। एमएलएटीज़ के अंतर्गत कई मामलों में सहायता के लिए अनुरोध किए जा सकते हैं, जैसे व्यक्तियों को चिन्हित करना और उन्हें खोजना, सबूत जमा करना और बयान लेना। कमिटी ने गौर किया कि विभिन्न देशो के साथ ऐसे 845 अनुरोध लंबित हैं। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए (i) ऐसे अनुरोधों के लंबित होने के कारणों को चिन्हित करने के लिए टास्क फोर्स बनाना और समाधानों का सुझाव देना, और (ii) प्राथमिकता के आधार पर अन्य देशों के साथ अधिक एमएलएटीज़ करना।
     
  • शरण संबंधी मुद्दे: अत्याचार से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा मांगने वाले व्यक्ति को शरण मांगने वाला (एसाइलम सीकर) कहा जाता है। कोई देश शरण मांगने वाले व्यक्ति को शरणार्थी का दर्जा दे सकता है। कमिटी ने गौर किया कि सामान्य स्थितियों में विदेशी नागरिकों के प्रवेश, उनके ठहरने और रवानगी से संबंधित मौजूदा घरेलू कानून शरणार्थियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उसने सुझाव दिया कि शरणार्थियों और शरण मांगने वाले लोगों के लिए घरेलू कानून न होने पर उनकी स्थिति पर एक घरेलू प्रोटोकॉल होना चाहिए जिनके तहत विशिष्ट एजेंसियों को विशिष्ट जिम्मेदारियां दी जाएं। इससे तुरंत प्रतिक्रिया सुनिश्चित होगी और जवाबदेही बढ़ेगी।
     
  • भारत ने शरणार्थियों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के 1951 के कन्वेंशन और उसे संशोधित करने वाले 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। कमिटी के अनुसार, भारत इस अवधारणा में विश्वास करता है कि शरणार्थी संकट में सभी देशों की साझा जिम्मेदारी होती है, लेकिन कन्वेंशन और प्रोटोकॉल में यह अवधारणा शामिल नहीं है। उसने सुझाव दिया कि मंत्रालय को साझा जिम्मेदारी पर भारत के रुख की वकालत करते हुए इन उपायों की समीक्षा पर जोर देना चाहिए। 
     
  • साइबर सुरक्षा: कमिटी ने साइबर सुरक्षा के लिए ग्लोबल आर्किटेक्चर तैयार करने के भारत के कूटनीतिक प्रयासों पर गौर किया। उसने विभिन्न क्षेत्रीय उपायों के साथ साइबर सुरक्षा पर सहयोग के लिए भारत के आईटी संसाधनों का लाभ उठाने का सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त कमिटी ने इस पर ध्यान दिया कि भारत में रूट सर्वर्स पर नियंत्रण नहीं है। रूट सर्वर्स किसी देश को इंटरनेट ट्रैफिक को रेगुलेट, उन्हें परिवर्तित या ब्लॉक करने की अनुमति देते हैं। कमिटी ने कहा कि विश्व में इस समय मौजूद 13 रूट सर्वर्स में से एक भी भारत में नहीं है। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) साइबर सुरक्षा पर घरेलू कानूनों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप मजबूत करना, (ii) साइबर हमलों को रोकने और उसे होने न देने पर ध्यान देना, और (iii) डेटा लोकलाइजेशन को हासिल करने के लिए हमारी एल्गोरिदम विकास क्षमता का लाभ उठाना।
     
  • वित्तीय अपराध: कमिटी ने वित्तीय अपराधों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी संरचना बनाने का सुझाव दिया जोकि अधिकाधिक सीमापारीय हो। उसने उन देशों के नेटवर्क को बढ़ाने का भी सुझाव दिया जिनके साथ आपराधिक मामलों में भारत की एमएलएटीज़ हों (वर्तमान में ऐसे 42 देश हैं)। इसके अतिरिक्त उसने कहा कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी एक्ट, 2018 के अंतर्गत (आपराधिक मुकदमे का सामना करने से बचने के लिए देश छोड़ने वाले या मुकदमे का सामना करने के लिए देश लौटने से इनकार करने वाले आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों को जब्त करने का प्रयास करता है): (i) किसी व्यक्ति को भगोड़ा अपराधी घोषित करने की न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमी है, और (ii) अपराधी के खिलाफ कार्यवाही के लिए, संबंधित धनराशि कम से कम 100 करोड़ रुपए होनी चाहिए। कमिटी ने छोटे अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही को आसान बनाने के लिए इस निचली सीमा की समीक्षा किए जाने का सुझाव दिया।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

 

 

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