स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
- रसायन और उर्वरकों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री आज़ाद कीर्ति झा) ने 6 अगस्त, 2026 को "देश में दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी के संदर्भ में राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की भूमिका, कामकाज और कर्तव्यों की समीक्षा" पर अपनी रिपोर्ट पेश की। एनपीपीए, डिपार्टमेंट ऑफ़ फार्मास्युटिकल्स का एक संबद्ध कार्यालय है। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- ट्रेड मार्जिन को सुव्यवस्थित करना: ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन (टीएमआर) उस मुनाफ़े के मार्जिन को सीमित करता है जिसे डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेलर किसी दवा की कीमत में जोड़ सकते हैं। इससे कीमतों में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी को रोका जा सकता है। कमिटी ने गौर किया कि कुछ एंटी-कैंसर दवाओं और कोविड-19 डिवाइस के लिए एक पायलट टीएमआर लागू किया गया है। हालांकि, ड्रग्स (प्राइसेज़ कंट्रोल) ऑर्डर (डीपीसीओ), 2013 में एक स्थायी टीएमआर फ़्रेमवर्क को शामिल करने के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं है। डीपीसीओ ज़रूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि वे दवाएं पूरे देश में सस्ती हों। कमिटी ने गौर किया कि कई अस्पताल और रिटेलर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर 20% से 60% तक की छूट देते हैं। इससे पता चलता है कि इसमें पहले से ही काफी ज़्यादा मार्जिन शामिल है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि मौजूदा मार्केट शेयर का 82% हिस्सा गैर अनुसूचित दवाओं का है, जिनकी कीमतों में सालाना 10% से ज़्यादा की बढ़ोतरी पर रोक है। इनकी कोई तय सरकारी कीमत नहीं होती, जिससे मैन्यूफैक्चरर्स अपनी मर्ज़ी से शुरुआती कीमत तय कर सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि समीक्षा और स्टेकहोल्डर्स से बातचीत के बाद, एक तय समय-सीमा के भीतर स्थायी टीएमआर फ्रेमवर्क को अंतिम रूप दिया जाए। उसने वर्गीकरण की व्यापक समीक्षा करने का भी सुझाव दिया ताकि उन कमियों को दूर किया जा सके जिनकी वजह से गैर अनुसूचित दवाएं मनमानी या अनुचित शुरुआती कीमतों पर लॉन्च की जा सकती हैं।
- ज़्यादा कीमत वसूलने (ओवरचार्जिंग) के कारण बकाया रकम की वसूली: कमिटी ने गौर किया कि 2025 तक ओवरचार्जिंग के लिए मांगी गई कुल रकम में से 8,526 करोड़ रुपए (85%) की वसूली नहीं हो पाई थी। इसमें से 70% रकम कानूनी विवाद के दायरे में है, और कुछ मामले तो 20 साल से भी ज़्यादा समय से लंबित हैं। एनपीपीए उन दवा कंपनियों से पैसा वसूलने के लिए ओवरचार्जिंग डिमांड नोटिस जारी करता है जो सरकारी कीमत की सीमा से ज़्यादा दाम पर दवाएं बेचती हैं। कमिटी ने उन मामलों के लिए तेज़ी से विवाद सुलझाने की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया जो कानूनी विवाद में नहीं हैं। उसने लंबे समय से लंबित अदालती मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित करने के लिए एनपीपीए के भीतर एक विशेष कानूनी सेल बनाने का भी सुझाव दिया।
- लागत-आधारित मूल्य निर्धारण के तरीके: कमिटी ने पाया कि दवाओं की कीमत के लिए केवल बाज़ार के आंकड़ों पर निर्भर रहने से कीमतों की असली गड़बड़ी का पता नहीं चल पाता है। ऐसा बहुस्तरीय आपूर्ति श्रृंखला में कुछ कंपनियों के बाज़ार एकाधिकार (मोनोपॉली) के कारण होता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को कानूनी संशोधनों के ज़रिए लागत-आधारित मूल्य निर्धारण को फिर से लागू करने की संभावना पर विचार करना चाहिए, खासकर उन मामलों में जहां अतिरिक्त मार्जिन बहुत ज़्यादा है या कीमतों में भारी अंतर पाया जाता है।
- बिक्री के आंकड़ों के दायरे को बढ़ाना: कमिटी ने कहा कि एनपीपीए एक प्राइवेट एजेंसी के आंकड़ों पर निर्भर है, जिसमें दवा बाज़ार का लगभग 70% हिस्सा ही शामिल है। इन आंकड़ों में अस्पताल की बिक्री, जन औषधि स्टोर, ट्रेड जेनेरिक और ई-कॉमर्स के ज़रिए सीधे सप्लाई जैसे हिस्से शामिल नहीं हैं। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) आंकड़े इकट्ठा करने की व्यवस्था में इन हिस्सों को शामिल किया जाए, (ii) आपात स्थितियों में दवाओं की किल्लत को दूर करने के लिए, जीवन रक्षक और क्रिटिकल केयर दवाओं की रियल-टाइम इन्वेंट्री ट्रैकिंग की व्यावहारिकता का आकलन किया जाए, और (iii) बिक्री के आंकड़े देने वाली थर्ड-पार्टी पर निर्भरता कम करने के लिए मौजूदा सरकारी मॉनिटरिंग डेटाबेस को मज़बूत किया जाए।
- कीमत तय करने में जनता की भागीदारी: कमिटी ने कहा कि नई दवाओं के लिए, एनपीपीए जनता की राय जानने के लिए 10 कामकाजी दिनों तक कीमत की ड्राफ्ट वर्कशीट्स अपलोड करता है। हालांकि 2022 और 2025 के बीच, 1,426 ड्राफ्ट वर्कशीट्स में से केवल 30 सुझाव या आपत्तियां मिलीं। ये सभी 30 सुझाव इंडस्ट्री की तरफ से थे। कमिटी ने सुझाव दिया कि एनपीपीए कीमत तय करने की प्रक्रिया में जनता की जागरूकता और स्टेकहोल्डर्स की भागीदारी बढ़ाने के लिए कदम उठाए।
- एनपीपीए में रिक्तियां: कमिटी ने कहा कि एनपीपीए में मंज़ूर 48 पदों में से 15 पद खाली हैं और ज़रूरी कामों के लिए कॉन्ट्रैक्ट या आउटसोर्स स्टाफ़ को लगाया गया है। कमिटी ने यह भी कहा कि 59 अतिरिक्त पदों का प्रस्ताव विचाराधीन है। कमिटी ने मौजूदा खाली पदों को नियमित नियुक्तियों के ज़रिए भरने और 59 अतिरिक्त पदों के लिए मंज़ूरी की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का सुझाव दिया।
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