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  • शहरी पेयजल पर विशेष बल देते हुए अमृत (AMRUT) की समीक्षा

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शहरी पेयजल पर विशेष बल देते हुए अमृत (AMRUT) की समीक्षा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • आवास एवं शहरी मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री मगंटा श्रीनिवासुलु रेड्डी) ने 12 दिसंबर, 2025 को शहरी पेयजल पर विशेष बल देते हुए अटल कायाकल्प एवं शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT) की समीक्षा पर अपनी रिपोर्ट पेश की। AMRUT को जून 2015 में शहरी क्षेत्रों में जलापूर्ति की सार्वभौमिक और समान पहुंच तथा सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के लक्ष्य के साथ शुरू किया गया था। इस मिशन में एक लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहरी स्थानीय निकाय शामिल थे। इसे अक्टूबर 2021 में AMRUT 2.0 में समाहित कर लिया गया। AMRUT 2.0 के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है: (i) शहरी जल सुरक्षा में सुधार, (ii) शहरी गवर्नेंस को मजबूत करना, और (iii) संस्थागत एवं तकनीकी क्षमताओं का निर्माण करना। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

  • फंडिंग: वर्ष 2011 की उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति (एचपीईसी) ने 2012-2031 की अवधि के लिए शहरी जलापूर्ति अवसंरचना के लिए 3.2 लाख करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता का अनुमान लगाया था। कमिटी ने कहा कि अमृत और अमृत 2.0 के तहत स्वीकृत कुल राशि लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपए है जो अनुमानित आवश्यकता का 50% है। एचपीईसी ने अनुमान लगाया था कि संचालन और रखरखाव (ओएंडएम) लागत लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपए होगी। कमिटी ने कहा कि ओएंडएम के लिए धन अपर्याप्त रहा है जिससे मिशन की कार्यक्षमता कम हो जाती है। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) केंद्रीय धनराशि को बढ़ाना, विशेष रूप से अल्प सेवित क्षेत्रों में, (ii) प्रोत्साहन-आधारित तंत्र के माध्यम से शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) द्वारा ओएंडएम को सहायता प्रदान करना, और (iii) 2047 तक के दृष्टिकोण के साथ शहरी जल क्षेत्र की दीर्घकालिक वित्तीय आवश्यकताओं का आकलन करना।

  • एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करना: कमिटी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि शहरी जल प्रबंधन के लिए विभिन्न चरणों में कई एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है। कमिटी ने योजना, वित्तपोषण, कार्यान्वयन, रखरखाव और संचालन के लिए जिम्मेदार निकायों के बीच अपर्याप्त समन्वय पर भी गौर किया। कमिटी ने प्रमुख मंत्रालयों और योजना निकायों के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित भूमिकाओं के साथ एक समर्पित मंच स्थापित करने का सुझाव दिया।

  • निगरानी डेटा की गुणवत्ता में सुधार: कमिटी ने गौर किया कि एक मजबूत डेटा निगरानी तंत्र का भी अभाव है। कमिटी ने कई सुझाव दिए जैसे पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति, 24x7 आपूर्ति की स्थिति और वितरण संबंधी हानियों जैसे प्रमुख मापदंडों पर नज़र रखने के लिए एक डिजिटल डैशबोर्ड स्थापित किया जाए। उसने राज्यों और स्थानीय स्थानीय निकायों द्वारा किए गए व्यय पर नज़र रखने के लिए एक प्रणाली स्थापित करने का भी सुझाव दिया।

  • जलापूर्ति संबंधी इंफ्रास्ट्रक्चर: अमृत 2.0 योजना के तहत, प्रतिदिन 1,652 मिलियन लीटर (MLD) जल उपचार क्षमता के विस्तार या जीर्णोद्धार को मंजूरी दी गई है। इसके मुकाबले अब तक केवल छह MLD (0.4%) ही पूरा हुआ है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि पाइप से पानी की आपूर्ति राज्यों में अलग-अलग है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय राज्यवार सख्त लक्ष्य निर्धारित करे, पिछड़े राज्यों को लक्षित सहायता प्रदान करे, वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट अनिवार्य करे और अमृत 2.0 के तहत वित्तपोषण को परिणामों से जोड़े।

  • सतत विकास उपायों का कार्यान्वयन: कमिटी ने जल निकायों की जीर्णोद्धार परियोजनाओं के धीमे कार्यान्वयन (पूर्णता दर 22%) और डेटा संग्रह तथा जमीनी कार्रवाई के बीच अंतर पर गौर किया। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) चिन्हित शहरी जल निकाय परियोजनाओं के अनुमोदन में तेजी लाना, (ii) अधिक धनराशि और व्यापक शहरी कवरेज के साथ उथले जलभृत (एक्विफर) प्रबंधन कार्यक्रम का विस्तार करना, और (iii) स्पष्ट लक्ष्यों, निगरानी और ट्रैकिंग प्रणालियों के साथ एक राष्ट्रीय शहरी जलभृत पुनर्भरण रणनीति (नेशनल अर्बन एक्विफर रीचार्ज स्ट्रैटेजी) तैयार करना।

  • राजस्व रहित जल (एनआरडब्ल्यू) में कमी लाना: एनआरडब्ल्यू वितरण प्रणाली में आने वाले जल और उपभोग के लिए बिल किए गए जल के बीच का अंतर होता है। यह रिसाव (लीकेज) या चोरी या बिना बिल वाली खपत के कारण हुए पानी के नुकसान को दर्शाता है। एचपीईसी के अनुसार, 2011 में एनआरडब्ल्यू जल उत्पादन का लगभग 50% था। कमिटी ने गौर किया कि राज्यों और स्थानीय स्थानीय निकायों को एनआरडब्ल्यू स्तर को 20% से नीचे लाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया गया लेकिन इसके बावजूद एनआरडब्ल्यू का स्तर कम नहीं हुआ। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय राज्यों और स्थानीय स्थानीय निकायों के साथ मिलकर काम करे, प्रोत्साहन प्रणाली को लागू करे और प्रत्येक शहर के एनआरडब्ल्यू स्तर और स्मार्ट मीटरिंग की स्थिति को प्रकाशित करे।

  • अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को सुदृढ़ बनाना: कमिटी ने अपशिष्ट जल उत्पादन और उपचार के बीच अंतर पर गौर किया। फरवरी 2021 तक शहरी क्षेत्रों में कुल 48,004 MLD अपशिष्ट जल उत्पादन के मुकाबले, स्थापित उपचार क्षमता 30,001 MLD थी, जिसकी क्षमता उपयोग दर 56% थी। कमिटी ने यह भी गौर किया कि केवल 11 राज्यों में ही अपशिष्ट जल पुन: उपयोग की औपचारिक नीतियां हैं, और अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग सीमित बना हुआ है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) मौजूदा उपचार क्षमता का अधिकतम उपयोग, (ii) पूर्ण अपशिष्ट जल उपचार के लिए पर्याप्त अपशिष्ट उपचार संयंत्रों की स्थापना, और (iii) शहरी अपशिष्ट जल उत्पादन और उपचार क्षमता के आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट करना। कमिटी ने राष्ट्रीय शहरी अपशिष्ट जल पुनः उपयोग नीति तैयार करने का भी सुझाव दिया जिसमें वास्तविक पुनः उपयोग को ट्रैक किया जा सके।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

 

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