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  • कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण और वन मंजूरी की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाना

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कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण और वन मंजूरी की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाना

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कोयला, खान और इस्पात से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री अनुराग ठाकुर) ने 10 दिसंबर, 2025 को 'कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण और वन मंजूरी की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाने' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। पर्यावरण (संरक्षण) एक्ट, 1986 और पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी (ईसी) आवश्यक है। वन (संरक्षण) एक्ट, 1980 के तहत वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग, जिसमें कोयला खनन कार्य भी शामिल हैं, के लिए परिवर्तित करने हेतु वन मंजूरी (एफसी) अनिवार्य है। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • राज्य स्तर पर मंजूरियां: कोयला खनन के लिए खनन पट्टे के क्षेत्रफल के आधार पर पूर्व-अनुमति (ईसी) की आवश्यकता होती है। 500 हेक्टेयर से अधिक की परियोजनाओं का मूल्यांकन केंद्रीय स्तर पर किया जाता है, जबकि 500 ​​हेक्टेयर से कम की परियोजनाओं का मूल्यांकन संबंधित राज्य प्राधिकरणों द्वारा किया जाता है। कमिटी ने कहा कि 2022 से अब तक 500 हेक्टेयर से कम की परियोजनाओं के लिए केवल 12 ईसी दी गई हैं।

  • मंजूरियों के लिए लगने वाला समय: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को ईसी देने में औसतन 15 से 18 महीने लगते हैं, जबकि वाणिज्यिक कोयला ब्लॉकों के लिए यह अवधि लगभग 26 महीने है। एफसी के लिए पीएसयू को औसतन 24 से 30 महीने लगते हैं और वाणिज्यिक कोयला ब्लॉकों के लिए यह अवधि 34 महीने तक हो सकती है। कमिटी ने विभिन्न अनुमोदन प्राधिकरणों के बीच समन्वय में सुधार करने और सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच लगने वाले औसत समय में अंतर को कम करने का सुझाव दिया।

  • सिंगल विंडो क्लीयरेंस के बाहर की मंजूरियां: सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम (एसडब्ल्यूसी) का उद्देश्य खानों के संचालन के लिए आवश्यक मंजूरियों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना है। परिवेश (PARIVESH) पोर्टल पर्यावरण, वन, वन्यजीव और तटीय विनियमन क्षेत्र की मंजूरियों के लिए एक सिंगल-विंडो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म प्रदान करता है। कमिटी ने कहा कि विभिन्न मंजूरी प्रणालियां अभी भी अलग-अलग संचालित हो रही हैं। इनमें खान सुरक्षा महानिदेशालय, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण और जल संसाधन विभाग से प्राप्त मंजूरी शामिल हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि अलग-अलग प्रक्रियाओं के जरिए दी जाने वाली मंजूरियों को सिंगल-खिड़की फ्रेमवर्क के अंतर्गत लाया जाए।

  • लैंड बैंक की स्थापना: क्षतिपूर्ति वनरोपण (सीए) के मायने यह हैं कि वन (संरक्षण) एक्ट, 1980 के तहत वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने पर बदले में दूसरे स्थानों पर नए पेड़ लगाए जाएं। कमिटी ने सीए भूमि को चिन्हित करने और हस्तांतरण में आने वाली चुनौतियों पर गौर किया। कमिटी ने कहा कि सीए की प्रति हेक्टेयर लागत राज्यों में काफी भिन्न है, जो नौ लाख रुपए से लेकर 22 लाख रुपए तक है। कमिटी ने सुझाव दिया कि राज्य सीए के लिए उपयुक्त अवक्रमित वन भूमि और गैर-वन भूमि के पूर्व-पहचाने गए (प्री-आइडेंटिफाइड) लैंड बैंक बनाएं।

  • भूमि रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण: कमिटी ने कहा कि भूमि परिवर्तन आदेश और वृक्ष कटान अनुमतियां देने की प्रक्रिया राज्य-विशिष्ट कानूनों के जरिए रेगुलेट होती है जिसके कारण देरी होती है। कमिटी ने यह भी कहा कि ईसी और एफसी की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए यह भी जरूरी है कि राज्य के वन रिकॉर्ड्स अपडेटेड और सटीक हों। कमिटी ने राज्यों को डिजिटल भूमि मानचित्र प्रकाशित करने का सुझाव दिया जिनमें अभिलेखीय वन (सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज वन), मानित वन (जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं, पर जंगल जैसे दिखते हैं), गैर-वन भूमि और मानित सामुदायिक वनों (जिन पर किसी समुदाय का कानूनी या सामाजिक अधिकार है) को स्पष्ट रूप से अलग-अलग दर्शाया गया हो।

  • ग्राम सभा की मंजूरियों में देरी: सार्वजनिक परामर्श के माध्यम से ग्राम सभा की स्वीकृति, ईसी और एफसी प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। कमिटी ने कहा कि एफसी मिलने में देरी का सबसे बड़ा और आम कारण ग्राम सभाओं की मंजूरी मिलने में लगने वाला समय है। इस देरी के भी कई कारण हैं, जैसे विभिन्न राज्यों के बीच समन्वय न होना, स्थानीय आपत्तियों से निपटना और विभिन्न प्रशासनों के कार्यक्रमों के बीच सामंजस्य करना। कमिटी ने इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए ग्राम सभा के संकल्प और उसकी सत्यापन प्रक्रिया के लिए एक मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित करने का सुझाव दिया। साथ ही, देरी को कम करने के लिए सार्वजनिक सुनवाई के हाइब्रिड मोड की अनुमति देने का भी सुझाव दिया।

  • भूमिगत खनन को बढ़ावा देना: कमिटी ने कहा कि भूमिगत खनन परियोजनाएं सतह पर होने वाले नुकसान को कम करती हैं, भूमि और जंगलों के संरक्षण में सहायक होती हैं, भूमि सुधार की लागत को कम करती हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाती हैं। कमिटी ने भूमिगत कोयला खनन के लिए नीति को सरल बनाने और खनन प्रक्रियाओं के मानकीकरण का सुझाव दिया।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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