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  • फेक न्यूज़ पर अंकुश लगाने की व्यवस्था की समीक्षा

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फेक न्यूज़ पर अंकुश लगाने की व्यवस्था की समीक्षा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डॉ. निशिकांत दुबे) ने 11 सितंबर, 2025 को “फेक न्यूज़ पर अंकुश लगाने की व्यवस्था की समीक्षा” पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • ‘फेक न्यूज़’ की परिभाषा: कमिटी ने कहा कि ‘फेक न्यूज़’ शब्द किसी भी कानून में परिभाषित नहीं है। कमिटी ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के लिए मौजूदा रेगुलेटरी तंत्र के तहत ‘फेक न्यूज़’ को परिभाषित करने का सुझाव दिया।

  • रेगुलेटरी तंत्र: कमिटी ने सुझाव दिया कि विभिन्न प्लेटफार्म्स पर फैली फेक न्यूज़ के मामलों की सुनवाई और दंड का सुझाव देने के लिए एक स्वतंत्र निकाय गठित करने के विकल्प पर विचार किया जाए। इस निकाय में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा अन्य हितधारकों के प्रतिनिधि होने चाहिए। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए जोकि फेक न्यूज़ से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संशोधनों का सुझाव दे। सीमा पार फेक न्यूज़ से निपटने के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) अन्य देशों के बेहतरीन कानूनों और तरीकों का इस्तेमाल करना, जैसे कि चुनावों के दौरान फैलाई जाने वाली गलत सूचनाओं पर फ्रांस का कानून, और (ii) एक अंतर-मंत्रालयी कार्य बल का गठन करना।

  • दंडात्मक प्रावधान: कमिटी ने कहा कि फेक न्यूज़ को पब्लिश पर कोई विशेष दंडात्मक प्रावधान नहीं है। वर्तमान में इसे व्यापक नियमों के तहत दंडित किया जा सकता है, जहां प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया के लिए दंड अलग-अलग हैं। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) संपादकों, प्रकाशकों और इंटरमीडियरीज़ की जवाबदेही सुनिश्चित करना, और (ii) फेक न्यूज़ बनाने या फैलाने के दोषी पत्रकार या क्रिएटर की मान्यता रद्द करने की व्यावहारिकता का पता लगाना।

  • सेल्फ-रेगुलेशन: कमिटी ने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा अनुमत 919 टीवी चैनलों में से 543 चैनल किसी भी सेल्फ रेगुलेटरी बॉडी (एसआरबी) के सदस्य नहीं थे। कमिटी ने यह भी कहा कि सैटेलाइट टीवी चैनलों के लिए दिशानिर्देशों के अनुसार प्रसारकों को या तो किसी पंजीकृत एसआरबी में शामिल होना होगा या अपना स्वयं का एसआरबी स्थापित करना होगा। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी प्रसारकों के पास एक सेल्फ-रेगुलेटरी तंत्र होना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि प्रत्येक मीडिया संगठन के लिए फैक्ट-चेकिंग व्यवस्था और आंतरिक ओम्बड्समैन नियुक्त करना अनिवार्य किया जाए।

  • शिकायत निवारण: कमिटी ने गौर किया कि प्रिंट मीडिया के मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के पास शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिए कोई समय सीमा नहीं है। कमिटी ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ताओं को डिजिटल रूप से ट्रैक करने और सूचित करने का कोई तंत्र नहीं है। कमिटी ने गौर किया कि फेक न्यूज़ वीडियोज़ के खिलाफ आदेश जारी होने के बाद उन्हें सर्कुलेशन से हटाने में देरी की जाती है। कमिटी ने फेक न्यूज़ से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए एक एकीकृत डिजिटल पोर्टल बनाने का सुझाव दिया। साथ ही, उसने इस प्रक्रिया के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने और समर्पित हेल्पलाइन नंबर जैसे बेहतरीन तरीकों का इस्तेमाल करने का भी सुझाव दिया।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और फेक न्यूज़: कमिटी ने कहा कि एआई में फेक न्यूज़ क्रिएट करने और फिर उनसे निपटने, दोनों की क्षमता है। फेक न्यूज़ से निपटने के लिए एआई का कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे भ्रामक विजुअल कंटेंट का पता लगाना, दावों की पुष्टि करना और गलत सूचना फैलाने वाले नेटवर्क की पहचान करना। कमिटी ने सुझाव दिया कि एआई टूल्स और मानव निगरानी के बीच संतुलन बनाया जाए। कमिटी ने एआई कंटेंट क्रिएटर्स के लिए लाइसेंसिंग की जरूरत का पता लगाने और एआई-जनरेटेड कंटेंट की लेबलिंग के लिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय का भी सुझाव दिया।

  • इंटरमीडियरीज़: सोशल मीडिया और दूसरे इंटरमीडियरीज़ को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) एल्गोरिदम में पारदर्शिता बढ़ाना, (ii) बार-बार अपराध करने वालों पर कड़ा जुर्माना लगाना, (iii) स्वतंत्र रेगुलेटरी निकाय की स्थापना, और (iv) एल्गोरिदम के पूर्वाग्रहों और फेक न्यूज़ को बढ़ाने में उनकी भूमिका से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के तरीके तलाशना। कमिटी ने मंत्रालय को ‘सेफ हार्बर’ के प्रावधानों से निपटने के लिए ठोस हल निकालने का सुझाव दिया ताकि फेक न्यूज़ के खिलाफ संघर्ष पर उसके असर को समझा जा सके। ‘सेफ हार्बर’ का अर्थ है, इंटरमीडियरीज़ को किसी भी थर्ड पार्टी कंटेंट के दायित्व से छूट देना, जोकि कुछ सुरक्षात्मक उपायों के अधीन है।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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