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सौर ऊर्जा परियोजनाओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • ऊर्जा से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री श्रीरंग अप्पा बार्ने) ने 8 दिसंबर, 2025 को 'देश में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने कहा कि 2030 तक कुल नियोजित सौर ऊर्जा क्षमता 306 GW है जो 292 GW के लक्ष्य से काफी अधिक है। हालांकि कमिटी ने कार्यान्वयन से संबंधित कई चुनौतियों को भी उजागर किया। प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • स्टोरेज क्षमता पर्याप्त नहीं: कमिटी ने कहा कि सौर ऊर्जा जैसी अक्षय ऊर्जा में उत्पादन की परिवर्तनशीलता सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। बैटरी और पंप स्टोरेज जैसी भंडारण प्रणालियों का उपयोग दिन के समय अतिरिक्त उत्पादन को स्टोर करने के लिए किया जा सकता है ताकि गैर-सौर ऊर्जा वाले घंटों के दौरान चरम मांग को पूरा किया जा सके। 243 GW की स्थापित क्षमता के मुकाबले, स्टोरेज की मौजूदा क्षमता लगभग 5.5 GW है। अनुमान है कि 2030 तक आवश्यक स्टोरेज क्षमता 61 GW होगी। कमिटी ने कहा कि स्टोरेज की क्षमता के धीमे विकसित होने का मुख्य कारण उसकी उच्च लागत है। कमिटी ने उम्मीद जताई कि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ लागत धीरे-धीरे कम हो जाएगी। कमिटी ने सुझाव दिया कि अनुसंधान संस्थानों को स्टोरेज के क्षेत्र में आरएंडडी के लिए अनुदान प्रदान किए जाएं। इस प्रकार स्वदेशीकरण होगा, और कीमतें भी कम हो सकती हैं।

  • सोलर पैनलों की घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग: कमिटी ने कहा कि भारत ने सोलर पैनलों के निर्माण में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, जून 2025 तक इसकी घरेलू उत्पादन क्षमता 91 GW प्रति वर्ष हो गई है। हालांकि यह अभी भी पॉलीसिलिकॉन, इनगॉट्स और वेफर्स जैसे कच्चे माल और घटकों के आयात पर निर्भर है। इनगॉट्स और वेफर्स के लिए 2 GWA क्षमता वाली संयंत्र परियोजना शुरू की जा चुकी है। वर्तमान में पॉलीसिलिकॉन के निर्माण की कोई क्षमता उपलब्ध नहीं है। कमिटी ने इनके लिए विशेष उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएं शुरू करने का सुझाव दिया।

  • लंबित ऊर्जा खरीद समझौते (पीपीए): जून 2025 तक लगभग 44 GW क्षमता के उन पीपीए पर हस्ताक्षर नहीं किए गए थे, जिनके लिए बोलियां आमंत्रित की गई थीं। मंत्रालय ने विलंब के लिए निम्नलिखित कारण बताए: (i) 2023-24 से कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा बोली लगाने के काम में काफी अधिक बढ़ोतरी हुई है, (ii) डिस्कॉम्स अक्षय ऊर्जा खरीदने के अपने कानूनी दायित्व का पालन नहीं करतीं, और (iii) डिस्कॉम्स भविष्य में टैरिफ दरों के कम होने की उम्मीद में कार्रवाई नहीं कर रहीं। मंत्रालय ने एजेंसियों को राज्यों की मांग के अनुरूप बोलियां लगाने और डिस्कॉम्स को जुर्माने से बचाने के लिए अक्षय ऊर्जा खपत दायित्व का पालन करने का सुझाव दिया।

  • ट्रांसमिशन परियोजनाओं के लिए चुनौतियां: कमिटी ने अक्षय ऊर्जा की ट्रांसमिशन परियोजनाओं में देरी के प्रमुख कारणों के रूप में पर्यावरण एवं वन संबंधी स्वीकृतियों में देरी और मार्गाधिकार (राइट ऑफ वे) के लिए क्षतिपूर्ति जैसे मुद्दों का जिक्र किया। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) राज्यों द्वारा मार्गाधिकार के लिए समान क्षतिपूर्ति दिशानिर्देश अपनाना, (ii) स्वीकृतियों के लिए एक समर्पित पोर्टल स्थापित करना, और (iii) अधिकारियों के बीच समन्वय में सुधार करना।

  • भूमि संबंधी मुद्दे: कमिटी ने कहा कि प्रतिस्पर्धी उपयोग और क्षतिपूर्ति की राशि में भिन्नता के कारण बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए भूमि अधिग्रहण अभी भी कठिन बना हुआ है। कमिटी ने सुझाव दिया कि समस्याओं को आसानी से चिन्हित करने और उनके समयबद्ध समाधान के लिए एक सिंगल विंडो क्लीयरेंस तंत्र बनाया जाए।

  • क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना: कमिटी ने सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता में क्षेत्रीय असंतुलन पर गौर किया। जैसे उत्तर-पूर्व, हिमालयी, पूर्वी और द्वीपीय क्षेत्रों में सौर पैनल या संयंत्र कम लगाए गए। जुलाई 2025 तक स्थापित कुल 119 GW सौर क्षमता में से, इन क्षेत्रों का संयुक्त योगदान लगभग 3 GW (2.6%) है। उसने यह भी कहा कि सौर और अन्य अक्षय ऊर्जा को लंबी दूरी तक ट्रांसमिट करना, महंगा और कम प्रभावी, दोनों है। कमिटी ने सुझाव दिया कि केंद्रीय वित्तीय सहायता को समय पर उपलब्ध कराया जाए तो इन क्षेत्रों में सौर ऊर्जा विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

  • सौर ऊर्जा संयंत्रों की रेटिंग: कमिटी ने कहा कि सौर ऊर्जा संयंत्रों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए कोई विश्वसनीय प्रणाली मौजूद नहीं है। कमिटी ने यह भी कहा कि सौर ऊर्जा, भूमि और अन्य संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए एक रेटिंग फ्रेमवर्क जरूरी है। कमिटी ने जल्द से जल्द ड्राफ्ट रेटिंग फ्रेमवर्क को पूरा करने का सुझाव दिया ताकि पायलट परियोजनाओं और फील्ड टेस्ट्स को समय पर पूरा किया जा सके।

  • पीएम सूर्य घर योजना: इस योजना का उद्देश्य 2026-27 तक एक करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर पैनल लगाना है। जून 2025 तक 16 लाख इंस्टॉलेशन पूरे हो चुके हैं (16%)। कमिटी ने कहा कि इसकी गति धीमी है क्योंकि उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है।

  • पीएम-कुसुम: कमिटी ने योजना के अंतर्गत धीमी प्रगति पर प्रकाश डाला: (i) घटक-ए के अंतर्गत 6% प्रगति, जो विकेंद्रीकृत ग्रिड-कनेक्टेड सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के लिए सहायता प्रदान करता है, (ii) घटक-बी के अंतर्गत 60% प्रगति, जो डीजल पंपों के स्थान पर ऑफ-ग्रिड सोलर पंपों को बढ़ावा देता है, और (iii) घटक-सी के अंतर्गत 17% प्रगति, जो मौजूदा ग्रिड-कनेक्टेड कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित करता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) निगरानी में सुधार करना ताकि यह सुनिश्चित हो कि काम समय पर पूरा हो गया और (ii) 7.5 हॉर्सपावर से अधिक क्षमता वाले सौर पंपों के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता को बढ़ाना ताकि जल की कमी वाले क्षेत्रों में सिंचाई की जरूरतों को पूरा किया जा सके।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

 

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