स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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पब्लिक एकाउंट्स कमिटी (चेयर: श्री के. सी. वेणुगोपाल) ने 22 जुलाई, 2026 को रक्षा ऑफ़सेट्स का प्रबंधन पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने रक्षा अनुबंधों के तहत ऑफ़सेट दायित्वों के कार्यान्वयन की समीक्षा की। अनुबंध में मौजूद ऑफ़सेट प्रावधान के तहत, विक्रेता (विदेशी वेंडर) के लिए खरीदार को प्रतिपूर्ति करना जरूरी होता है। यह काम रिवर्स परचेज़, स्थानीय उद्योग में निवेश या खरीदार देश में अनुसंधान एवं विकास के ज़रिए किया जा सकता है। डिफेंस ऑफ़सेट नीति को सबसे पहले 2005 में रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) के तहत लागू किया गया था। कमिटी के प्रमुख निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
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कमियों को दूर करना: कमिटी ने ऑफ़सेट नीति से जुड़ी कई समस्याओं पर गौर दिया जैसे कि ऑफ़सेट दायित्वों को पूरा न करना, गलत ऑफ़सेट दावे जमा करना और सत्यापन की धीमी गति। कमिटी ने यह भी पाया कि 18 दिसंबर, 2025 तक लगभग 45% ऑफ़सेट दायित्व पूरे नहीं हुए थे। इसका मुख्य कारण यह है कि ऑफ़सेट अनुबंधों पर हस्ताक्षर करते समय जिन ऑफ़सेट परियोजनाओं की योजना बनाई गई थी, वे असल में शुरू नहीं हो पाईं। कमिटी ने गौर किया कि ऑफ़सेट दावों का लंबित रहना या रद्द होना, अनुबंध प्रबंधन प्रणाली में कमियों को दर्शाता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) समय-सीमा तय की जाए और उनका पालन किया जाए और (ii) अनुबंध तैयार करने के शुरुआती चरणों में ही रक्षा लेखा महानियंत्रक या रक्षा ऑफ़सेट प्रबंधन विंग को शामिल किया जाए।
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ऑफ़सेट के तरीकों को सुव्यवस्थित करना: विदेशी वेंडर अपनी ऑफ़सेट जिम्मेदारियों को कई तरीकों से पूरा कर सकते हैं जैसे कि भारतीय कंपनियों से सीधे खरीदारी, डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) या तकनीक का हस्तांतरण। कमिटी ने गौर किया कि 2007 से मार्च 2018 के बीच ऑडिट किए गए अनुबंधों में ऑफ़सेट के कुल मूल्य का 90% हिस्सा प्रत्यक्ष खरीद के ज़रिए पूरा किया जाना निर्धारित था। हालांकि सीधे खरीद की तुलना में निवेश और तकनीक भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद हो सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि नीति में बदलाव करके सीधे खरीद को एक सीमा तक रखा जाए और यह अनिवार्य किया जाए कि ऑफ़सेट के कम से कम 50% दायित्व एफडीआई या तकनीक हस्तांतरण के ज़रिए पूरे किए जाएं।
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सभी रक्षा खरीद के लिए ऑफ़सेट नीति को बढ़ाना: अभी ऑफ़सेट नीति ‘बाय (ग्लोबल) कैटेगरी’ में विदेशी वेंडर्स पर लागू होती है जो कम से कम 2,000 करोड़ रुपए की खरीद के लिए होती है। उन्हें अनुबंध की कीमत का 30% निवेश करना होता है। कमिटी ने कहा कि 2,000 करोड़ रुपए की सीमा के कारण कई खरीद ऑफ़सेट की शर्तों से बाहर हो सकती हैं। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) इस नीति को सभी पूंजी अधिग्रहण तक बढ़ाना, और (ii) ज़रूरी निवेश की सीमा को 30% से कम करना। साथ ही उसने यह सुनिश्चित करने का सुझाव दिया कि ऑफ़सेट पार्टनर कोई भारतीय कंपनी हो या किसी भारतीय कंपनी के साथ संयुक्त उपक्रम हो।
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विशेष क्षेत्रों में ऑफ़सेट निवेश: कमिटी ने गौर किया कि सिंगापुर और ताइवान जैसे देशों ने ऑफ़सेट निवेश के लिए कुछ विशेष क्षेत्रों को तय किया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि रक्षा मंत्रालय भी रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारत के दूसरे डिफेंस मैन्यूफैक्चरर्स की ज़रूरतों के आधार पर ऑफ़सेट सपोर्ट के लिए विशेष क्षेत्रों पर ध्यान दे। जैसे भारत मिलिट्री एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉलिंग में आत्मनिर्भर नहीं है। कमिटी ने सुझाव दिया कि उन तकनीक और उत्पादों की सूची को सुव्यवस्थित किया जाए जिनका इस्तेमाल विदेशी वेंडर ऑफ़सेट दायित्वों को पूरा करने के लिए कर सकते हैं। इस सूची में ऐसी तकनीक शामिल होनी चाहिए जिनकी डीआरडीओ और भारतीय डिफेंस मैन्यूफैक्चरर्स द्वारा सक्रिय रूप से मांग की जा रही है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि सूची में शामिल कुछ उत्पाद अब इतने मजबूत और विकसित हो चुके हैं कि उन्हें सरकार या ऑफ़सेट नीतियों के सहारे की जरूरत नहीं है। वे अपने दम पर बाजार में बिक सकते हैं। कमिटी ने ऐसे सभी उत्पादों को सूची से हटाने का सुझाव दिया।
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मल्टीप्लायर्स को सुव्यवस्थित करना: रक्षा ऑफ़सेट नीति के तहत विदेशी वेंडर्स को कुछ विशेष क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से मल्टीप्लायर्स का इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई मल्टीप्लायर लागू किया जाता है तो विदेशी वेंडर्स द्वारा प्राप्त कुल ऑफ़सेट क्रेडिट को निर्धारित करने के लिए निवेश के वास्तविक मूल्य को एक विशिष्ट कारक (चार तक) से गुणा किया जाता है। इस क्रेडिट का इस्तेमाल ऑफ़सेट दायित्वों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। कमिटी ने गौर किया कि मल्टीप्लायर नीति से अभी तक कोई खास नतीजे नहीं मिले हैं। कमिटी ने अहम क्षेत्रों और तकनीक के लिए दो का मल्टीप्लायर लागू करने और बाकी सभी मल्टीप्लायर्स को हटाने का सुझाव दिया।
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ऑफ़सेट दायित्वों को पूरा न करने पर जुर्माना: अभी दायित्व पूरा न करने की स्थिति में वेंडर पर अधूरे ऑफ़सेट दायित्व का 5% जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि कमिटी ने गौर किया कि इस प्रावधान के बावजूद दायित्वों को पूरा करने में देरी हो रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय विदेशी वेंडर्स को नियम तोड़ने से रोकने के लिए नीति में एक ‘इंडैमनिटी क्लॉज़’ (हर्जाना या क्षतिपूर्ति की शर्त) शामिल करे। साथ ही कमिटी ने ऑफ़सेट दायित्व को पूरा करने की शर्त को मुख्य खरीद अनुबंध के प्रदर्शन से जोड़ने का भी सुझाव दिया।
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