स्टैडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
-
उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: सुश्री कनिमोझी करुणानिधि) ने 23 जुलाई, 2026 को बेबी प्रॉडक्ट्स और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मात्रा के विशेष संदर्भ के साथ पैकेटबंद उत्पादों का रेगुलेशन विषय पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने पाया कि पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में अत्यधिक मात्रा में चीनी के सेवन से स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझावों में निम्न शामिल हैं:
-
चीनी के स्तर का वर्गीकरण ज़रूरी: खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग और डिस्प्ले) रेगुलेशंस, 2020 के तहत पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के लेबल पर कुल चीनी और अलग से मिलाई गई चीनी की मात्रा लिखना अनिवार्य है। यह जानकारी कुल ग्राम (सटीक आंकड़ों में) और रिकमेंडेड डायटरी अलाउंस (यानी किसी व्यक्ति को एक दिन में कितनी चीनी खानी चाहिए) के प्रतिशत के तौर दी जाती है। कमिटी ने गौर किया कि सामान खरीदते समय सभी ग्राहकों के लिए इन आंकड़ों और प्रतिशत को आसानी से समझना मुश्किल होता है। इससे यह समझने में मदद नहीं मिलती कि चीनी का स्तर ज़्यादा है या कम। चेतावनी वाले लेबल या रंगों वाले इंडिकेटर जैसे आसान तरीकों की कमी के कारण पैकेट पर लिखी जानकारी उतनी असरदार नहीं रह जाती। कमिटी ने सुझाव दिया कि एक अनिवार्य चीनी स्तर वर्गीकरण संरचना लागू की जाए जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के अनुसार हो। इसके अलावा चीनी की जानकारी देने और लेबल लगाने वाले नियम सभी तरह के पैकेटबंद उत्पादों पर एक समान रूप से लागू होने चाहिए।
-
पैकेट के सामने की तरफ लेबल: पैकेट के सामने की तरफ लेबलिंग से ग्राहकों को किसी उत्पाद की न्यूट्रिशनल वैल्यू (पोषक तत्वों की जानकारी) आसानी से पता चल जाती है। कमिटी ने गौर किया कि पैकेट के सामने की तरफ लेबल लगाने वाले नियमों (फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग रेगुलेशन) का ड्राफ्ट सितंबर 2022 में सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था। हालांकि अभी तक अंतिम रेगुलेशंस को अधिसूचित नहीं किया गया है। कमिटी ने सुझाव दिया गया कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) इन नियमों को अंतिम रूप दे और इनकी घोषणा करे। इसमें चीनी के अधिक, मध्यम और निम्न स्तर को दिखाने के लिए रंगों वाले इंडिकेटर जैसे लेबल लगाने के तरीके अपनाने का भी सुझाव दिया गया। इसके अलावा शिशु खाद्य उत्पादों के पैकेट के सामने वाले हिस्से पर यह जानकारी होनी चाहिए कि उस उत्पाद में मौजूद चीनी, उस उम्र के बच्चे की रोज की कुल ऊर्जा खपत का कितना प्रतिशत हिस्सा पूरा करती है।
-
चीनी की मात्रा को रेगुलेट करना: कमिटी ने सुझाव दिया कि एफएसएसएआई की वैज्ञानिक संस्थाओं को हर दो-तीन वर्ष में पैकेटबंद शिशु खाद्य पदार्थों में चीनी की मात्रा की समीक्षा करनी चाहिए। कमिटी ने यह भी सुझाव दिया कि बिना चीनी या बहुत कम चीनी वाले फ़ॉर्मूले को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, एफएसएसएआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए: (i) गुमराह करने वाले दावों के बार-बार उल्लंघन पर क्रमिक जुर्माना, (ii) नियमों का पालन न करने वाले विज्ञापनों को हटाने या उनमें सुधार करने के लिए समय-सीमा, (iii) उल्लंघनों का नियमित सार्वजनिक खुलासा, और (iv) डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए उपभोक्ताओं के लिए शिकायत की व्यवस्था।
-
समय-समय पर दोबारा जांच: कमिटी ने गौर किया कि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि शुरुआती मंज़ूरी या लाइसेंस मिलने के बाद किसी उत्पाद के फ़ॉर्मूले की समय-समय पर दोबारा जांच की जाए। बाद में फ़ॉर्मूले में बदलाव करने से चीनी की मात्रा बढ़ सकती है और सामग्री के मिश्रण में दूसरे बदलाव भी हो सकते हैं, जिनका पता नहीं चल पाता। कमिटी ने एफएसएसएआई को सुझाव दिया कि वह शुरुआती मंज़ूरी के बाद उत्पादों की समय-समय पर या जोखिम के आधार पर दोबारा जांच करने की एक स्थायी व्यवस्था बनाए।
-
तीसरे पक्ष की तरफ से पुष्टि: कमिटी ने गौर किया कि स्वतंत्र जांच न होने के कारण ग्राहक खाद्य पदार्थ कंपनियों के दावों पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाते। कमिटी ने एफएसएसएआई को सुझाव दिया कि वह चीनी की मात्रा और स्वास्थ्य से जुड़े दावों की किसी तीसरे पक्ष द्वारा वैज्ञानिक पुष्टि कराने की व्यवस्था को मज़बूत करे। इसके लिए एफएसएसएआई को अनिवार्य और स्वतंत्र कानूनी जांच का नियम बनाना चाहिए। इसके अलावा स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थानों की एक अधिकृत सूची बनाई जानी चाहिए जिन्हें कंपनियों के दावों और सबूतों की समीक्षा और उन्हें प्रमाणित करने का अधिकार हो।
-
उपभोक्ताओं के लिए जागरूकता अभियान: कमिटी ने पाया कि अगर उपभोक्ताओं को डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर के सुझावों के बारे में जानकारी दी जाए तो उनके व्यवहार में हमेशा के लिए बदलाव आ सकता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि देश भर में उपभोक्ता जागरूकता अभियान चलाए जाएं जैसे कि "ईट राइट" (Eat Right) पहल। कमिटी ने स्कूलों, आंगनवाड़ियों, मैटरनिटी क्लीनिकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए लक्षित पहुंच बनाने का भी सुझाव दिया है।
-
ई-कॉमर्स उत्पादों की निगरानी: कमिटी ने गौर किया कि डिजिटल ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले पैकेटबंद उत्पादों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि इन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले, गलत लेबल वाले पैकेटबंद खाद्य उत्पादों से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए एक विशेष निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। कमिटी ने इसके लिए एफएसएसएआई और उपभोक्ता मामलों के विभाग के बीच बेहतर तालमेल बनाने का भी सुझाव दिया।
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।
